सं.पु.
सं.व्यष्टि
1.समूह या समाज से अलग किया हुआ।
- उदा.--निकाई छाई तैं प्रकट प्रभुताई सिख नखा, समस्टी व्यस्टी तैं सजन दिव द्रस्टी रिखि सखा धरै तूं धारै तूं परज प्रत पारै धन धनी, सभी कौ संहारै प्रळय लय धारैं करसनी।--ऊ.का.
2.सनारू नामक आचार्य का शिष्य व विप्रचित्ति का आचार्य।