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संचय  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.समूह, झुण्ड।
  • उदा.--1..अंत्रावळि अलगरद्ध रूप संचय संचारै। जळ नीली निभ सिंचय जाळ इत तिरत अपारै।--वं.भा.
  • उदा.--2..जत्थ जलौका जूहकी सु धमनी छवि धारै। गंडक संचय अंगुलीन, बनि चपळ विहारै।--वं.भा.
2.चीजें इकट्ठी करने की क्रिया या भाव।
3.जमा करना, संकलन।
4.इकट्टी की हुई चीजों व रुपयों आदि का ढेर या राशि। (ह.नां.मा.)
  • उदा.--1..वरस एक फौज घेरै रही भीतर नूं संचय खूटौ।--गोपाळदास गौड़ री वारता
  • उदा.--2..अर बूंदी रा ही अमल में जैतौ कहै जिण ठांम सांमग्री रा संचय करि बरात बुलावण धारी।--वं.भा.
  • उदा.--3..आढौ रण गळियार उठायौ, लागि न्नजांन अप्प पुर लायौ। करि उपचार अगद वपु कीधौ, दुलभ वित्त संचय न्नप दीधौ।--वं.भा.
5.अधिकता, बाहुल्य।
रू.भे.
संच। [सं.संचयन]
6.शव या मृत्यु शरीर की भस्म बन जाने के पश्चात्‌ अस्थि बीनने की क्रिया।
रू.भे.
संच, संचै।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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