सं.पु.
सं.
1.समूह, झुण्ड।
- उदा.--1..अंत्रावळि अलगरद्ध रूप संचय संचारै। जळ नीली निभ सिंचय जाळ इत तिरत अपारै।--वं.भा.
- उदा.--2..जत्थ जलौका जूहकी सु धमनी छवि धारै। गंडक संचय अंगुलीन, बनि चपळ विहारै।--वं.भा.
2.चीजें इकट्ठी करने की क्रिया या भाव।
4.इकट्टी की हुई चीजों व रुपयों आदि का ढेर या राशि। (ह.नां.मा.)
- उदा.--1..वरस एक फौज घेरै रही भीतर नूं संचय खूटौ।--गोपाळदास गौड़ री वारता
- उदा.--2..अर बूंदी रा ही अमल में जैतौ कहै जिण ठांम सांमग्री रा संचय करि बरात बुलावण धारी।--वं.भा.
- उदा.--3..आढौ रण गळियार उठायौ, लागि न्नजांन अप्प पुर लायौ। करि उपचार अगद वपु कीधौ, दुलभ वित्त संचय न्नप दीधौ।--वं.भा.
6.शव या मृत्यु शरीर की भस्म बन जाने के पश्चात् अस्थि बीनने की क्रिया।