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संदळी, संदली  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
वि.
1.चन्दन का, चन्दन के रंग का। सं.पु.--
1.चन्दन के रंग से मिलते-जुलते रंग का घोड़ा। (शा.हो.)
  • उदा.--1..लाखौरी सुरंग अजब लैत, किसमसी साह ज्यांनूं कुमैत। तेलिया मुहा संदळी तुरंग, सोसनी सबज हंसा सुरंग।--सू.प्र.
  • उदा.--2..कुमेत नीला समदा मगड़ा सेली समंद, भूवर बोर सोनेरी कागड़ा गंगाजळ नुकरा केळा महूवा घूमरा हरिया लीला गुलदार पंचकल्यांण पवण गुरड़ संजाब संदळी सीहा चकवा अबलख सिराजी। फेर ही अनेक रंग रा घोड़ा तयार कीजै छै।--रा.सा.सं.
3.एक प्रकार का शराब विशेष जिसमें चंदन की गंध मिला दी गई हो।
3.एक प्रकार का शराब विशेष।
  • उदा.--तठा उपरायंत दारु रा घड़ा मंगायजै छै। सू दारू किण भांत रौ छै? अैराक रौ वैराक, संदली रौ कंदली, फूल रौ अतर, बाली बझै धुंवांधोर तिवारा रौ काढियौ, बोदी वाड़ मं नाखियां जग उठै।--रा.सा.सं.
4.रव्वाजासरों का एक भेद विशेष जो पुरुषाकार (अण्डकोष) की जड़ सहित ही काट डालते हैं। (मा.म.)
5.वह हाथी जिसके बाहरी दांत नहीं होते हों।
6.मकान के अन्दर सामान रखने के निमित्त लगाया जाने वाला बड़ा और सीधा लम्बा चौड़ा पत्थर जिसका एक किनार दीवार से संलग्न होता है।
  • उदा.--इतरौ आया हीज। आइ नै करहौ बांधि नै ऊर पधारीया। देखै तौ संदली ऊपर रबाब पड़ीयौ छे। पीतांबर धरती ऊपर बिछायौ छै।--लाखै फूलांणी री वात


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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