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सजा  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
फा.सजा
1.किसी अपराध के कारण दिया जाने वाला दंड।
  • उदा.--1..--डावड़ी री बात सुणतां ई राजा तौ हाक्यौ-बाक्यौ रैग्यौ। रांणी री सजा दूजा जीव नैं क्यूं मिळै।--फुलवाड़ी
  • उदा.--2..बळिभद्र जी कृस्ण जी नै कहै छै। जु या अयोग्य बात करी। तिहि नै इसी सजा दीनी।--वेलि.
2.कारावास, कैद।
  • उदा.--विलूंब्यौ निधी नीर स्त्रीहाथ बांमै, पुरी मैं सकौ सीर हन्नोज पांमै। सजा हूं छुड़ायौ आई राव सेखौ, लाई पुत्र पित्रेस रौ लोप लेखो।--मे.म.
रू.भे.
सज्जा, सज्या, सझ्या।
क्रि.प्र.--करणी, दैणी, पाणी, भुगतणी, मिळणी, सुणाणी, होणी।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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