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सतत
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
कुशल क्षेम। (ह.नां.मा.) वि.(सं.) सदा, सर्वदा, हमेशा, निरंतर।
उदा.--
पांन संकुलित डाळ, तावड़ौ किसांण टाहै। बारै मासा
सतत
, जिनावर सरणौ भाळै।--दसदेव
2.सदैव, हमेशा।
उदा.--
करि उपचार अगद वपु कीधौ, दुलभ वित्त संचय त्रप दीधौ, पौळि व्राति 'दुरसै' जिण पाई, बढी
सतत
'सुरतांण' बडाई।--वं.भा.
नोट:
पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।
राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास
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