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साखा  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
सं.शाखा
1.वृक्ष की टहनी, डाल-डाली। (डिं.को.)
  • उदा.--सु गौरता ऊपरि स्यांमता किसी सोभै छै। जैस्यै मणी मैं हींडोळै मन धरि हींडै छै। मणि कौ हीडोळो बांध्यौ छै। मणिधर सरप हीडै छै। अर स्रीखंड चंदन की साखा हींडोळौ बाध्यौ छै।--वेलि.टी.
2.बांह, बाजू।
3.विभाग।
4.हाथ-पैर।
5.हाथ-पैरों की अंगुलियां।
6.वंश, कुल।
  • उदा.--साखा बियौ 'मयंक' पह सुभ्रम, मन अणबंछत तूझ मण। कलम कुरांण पांण तब कुंभा, बांचण लागा हर बयण।--महारांणा कुंभा रौ गीत
7.वटवृक्ष की झखड़ा जड़, शाखाशिफा।
  • उदा.--तठा उपरांति करि नै राजांन सिलांमति दारू री तूंगा लांगी सूं ओछाड़िआं घणै ठंडै ठांणी छांटि छांटि नै वडां री साखा सूं नागली थकी झूलै छै। पवन री हवा सूं टिप्पा खाइ नै रही छै।--रा.सा.सं.
8.किसी मूल वस्तु से निकले हुए उसके भेद, हिस्से।
9.किसी शास्त्र विद्या के अन्तर्गत उसका कोई भेद।
10.ऋषियों द्वारा अपने गोत्र या शिष्य परम्परा में चलाये गये वेद की संहिताओं के पाठ और क्रम भेद।
11.किसी विषय या सिद्धान्त के बारे में एक ही तरह के विचार या मत रखने वाले लोग, सम्प्रदाय, अनुयायी।
  • उदा.--1..ऊंच नीच फिर मंगै अगवा, संग लीयां रहै अपनी साखा। मांग भीख अर बंधै पोटा, खालिक दिसीया खाया खोटा।--अनुभववांणी
  • उदा.--2..सांमी मंडी मडाय कै, मन विखीया कै मांहि। सिख साखा दन बौहत की, खुधीया भाजै नांहि।--अनुभववांणी
रू.भे.
सक्ख, सख, सख्ख, साख।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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