सं.पु.
1.बरछी, भाला। (ना.डिं.को.)
2.हाथ, कर। (डिं.को.)
- उदा.--1..सुकरै गिर साहै सीस संबाहै राखि व्रजं ब्रजराज। सुरलोकि सराहै मौ मन माहै, ताइ प्रभू सिरताज।--पिं.प्र.
- उदा.--2..आकुळत व्याकुळत चलत नह आंवणै, पीव किण भांत आरांम पांमै। सुकर दै सकरचा नैण मूंदै सची, नागणी नाग सिर घडा नांमै।--महारांणा राजसिंहजी रौ गीत
- उदा.--3..इळा नभ भाळ पाताळ खप उपावण, कंपावण काळ विकराळ के केवी। सुकर प्रतमाळ किरमाळ जुग सम्हणी, दिपै डाढाळ घटियाळ देवी।--खेतसी बारहठ
- उदा.--4..काळ गिरद अथहां कळोधर, प्रतपाळा बंधन महाराज। सूरियंद भूप 'अमर' निज सुकरां, भांजै कुरंद बिया भाराथ।--महारांणा अमरसिंहजी रौ गीत
3.देखो 'सुक्र' (रू.भे.)
- उदा.--1..आराधी ईसरि मंदि महेसरि, पैठिसै कीरति परमेसर। जंप सै जोगेसर सुकर सैनीछर, सत रुसेसर नै ससिहर।--पी.ग्रं.
- उदा.--2..बळि राजा छळिया बहनांमी, निबिळै सै दोइ ब्रिख नाखि। एक कीयै तै इंदरै ऊपर, एक सुकर री काढी आंखि।--पी.ग्रं.
- उदा.--3..सुकर छाई वादळी, रही सनेसर छाय। डंक कहै भडळी वा, वरस्यां विना न जाय। दीवा वीती पंचमी, सोम सुकर गुरु मूळ। डंक कहै है भडळी, निपजै सातू तूळ। सोमां सुकरां सुर गुरां, जै चंदौ ऊगंत। डंक कहै है भडळी, जळ थळ एक करंत।--वर्षा विज्ञान