HyperLink
वांछित शब्द लिख कर सर्च बटन क्लिक करें
 

स्रंगार  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.श्रृंगारः
1.साहित्य के नौ रसों में से एक प्रसिद्ध एवं प्रमुख रस जो रसराज व रससम्राट माना जाता है। वि.वि.--श्रृंगार दो शब्दों के योग से बना है--श्रृंग तथा आर। श्रृंग का अर्थ कामोद्रेक अथवा काम की वृद्धि होता है। दूसरे शब्दों में काम अंकुरित होने को श्रृंग कहते हैं। 'आर' गत्यर्थ 'ऋ' धातु से बना है जिसका अर्थ यहाँ प्राप्ति है। इस प्रकार श्रृंगार कामोद्रेक अथवा काम वृद्धि की प्राप्ति का द्योतक है। साहित्य के नौ रसों में यह प्रधान माना गया है। इसी कारण श्रृंगार को विद्वान साहित्यकारों ने रस सम्राट माना है। इसके मुख्य दो भेद माने जाते हैं--संयोग तथा वियोग। मनुष्य की कामवासना से संबंधित बातों से मिलने वाला आनंद या सुख ही इस रस का मूल आधार है।
2.अपने आपको अधिक आकर्षक एवं सुंदर बनाने के लिए सुंदर वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने की क्रिया, सजावट।
3.किसी मूर्ति, शरीर आदि में ऐसी चीज जोड़ना या लगाना कि वे और अधिक आकर्षक बन जाय।
4.शोभा, सौंदर्य।
5.स्त्रियों के सौभाग्य व सौन्दर्य प्रशाधन सामग्री, आभूषण आदि।
6.मैथुन, रति, सम्भोग।
7.श्याम, कृष्ण। *
8.देखो 'सिणगार' (रू.भे.)
रू.भे.
संगार, सणंगार, सणगार, सयंगार, सिंगार, सिंघार, सिंणगार, सिणगार, सींणगार, स्यंगार, स्रिंगार।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

Project | About Us | Contact Us | Feedback | Donate | संक्षेपाक्षर सूची