सं.पु.
सं.हरणं
1.दूसरे की वस्तु को उसकी इच्छा के विपरी या उसकी जानकारी के बिना, अपने अधिकार में करने या ले लेने की क्रिया। छीनने, लूटने या चोरी करने की क्रिया या भाव।
2.वंचित करने की क्रिया या भाव।
3.हटाने, मिटाने या दूर करने की क्रिया या भाव। ज्यूं--पीड़ हरण, संकट हरण।
4.किसी को बलपूर्वक, चोरी या धोखे से उड़ा कर ले जाने तथा लेजाकर छुपा देने की क्रिया, अपहरण।
- उदा.--निरखै ततकाळ त्रिकाळ निदरसी, करि निरणै लागा कहण। सगळै दोख विवरज़ित साहौ, हूंतौ जई हूऔ हरण।--वेलि.
5.अपनी ओर खींचने की क्रिया, भाव या अवस्था। ज्यूं.--मन हरणख चीर हरण।
- उदा.--दुख वीसारण, मन हरण, जउ ई नाद न हुंति। हियड़उ रतन--तळाब ज्यउं, फूटी दइ दिसि जंति।--ढो.मा.
10.विद्यार्थी के लिए दिया जाने वाला दान।
11.यज्ञोपवीत के समय ब्रह्मचारी को दी जाने वाली भिक्षा।
1.चुराने वाला, चोरी करने वाला,
2.मिटाने वाला, दूरकरने वाला, नष्ट करने वाला।
- उदा.--बप रूप ओप नव धन वरण, हरण पाय--त्रय--ताप--हरि। गुणमांन दां नचाहै सु ग्रहि, कवि सुभ्यांन और ध्यांन करि।--रा.रू.