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हव  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.यज्ञ की अग्नि में किसी देवता के निमित्त दी जाने वाली आहुति, बलि, चढ़ावा।
2.आग, अग्नि।
3.यज्ञ। क्रि.वि.--
1.अब, इस समय, अभी।
  • उदा.--1..जगपत रांण तणां जाळाहळ, जगत कथै जस जुवौ जुवौ। हैवर दणियर अधर हालतौ, हव सवर आधार हुवौ।--महारांणा राजसिंह रौ गीत
  • उदा.--2..म बीह रे मूरख मूंछ मोडी, तूं बोलतु रावै नि कूडी। मइं ओलखी तउं हव अंगु साति, भाजउं जिसिइं कौरव सैन्य वाति।--सालिसूरि


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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